Saturday, July 14, 2007

मुसाफिर

हर मुकाम पर पहुँच घरौंदा तो बना ही लेता हूँ
फिर चंद दिन बिता के उसमे यादों से जुड़ जाता हूँ
कुछ पड़ोसी कुछ दोस्त कुछ अजनबी सभी के इर्द गिर्द
यूँ मंडराने लगती है ज़िन्दगी जैसे
बाशिन्दा-ए-अन्जुमन हूँ और मुसाफिर कभी था ही नहीं

फिर अचानक ये अहसास कि अब है अगली मंज़िल की तलाश
ये मुकाम मंज़िल नहीं बस एक पड़ाव था जो गुज़र गया
एक वो अहसास था जो बिन आहसास ही बिखर गया
ग़म-ख्वार भी निकल लिये अपनी मंज़िलों की ऒर
हाँ शायद यही ज़िंदगी है या मानो तो किस्मत का ज़ोर

फिर भी अब तक ख्वाब ही समझता रहा इस हकीक़त को
कि अचानक लगीं बाहर कि सर्द हवाऐं और तमतमाती धूप
हो परेशान ग़ौर से देखा तो पाया - वाह बहुत खूब !
अब तो एक एक कर दीवारों से ईंटें भी गिरने लगी थीं
खिड़कियों का कसूर नहीं दीवारें ही दगा देने लगी थीं

पर नया क्या है इस हिक़ायत में ये समझ नही पाया हूँ मै
पिछली मर्तबा भी तो ऐसा लगा था कि ये कहाँ आया हूँ मै
कि जब अचानक मिल गया था नया रास्ता नया काफिला
फिर मानकर चला था सफर और सोचा था बस चलना है
एक मुसाफिर हूँ और बस इसी ढर्रे मे दुनिया से गुज़रना है

कब कैसे गुम हो गया उस घरौंदे के मनसूयी उजालों मे
रोशनी ही मेरा अन्धेरा बनी, मै घिरा मजाज़ी सवालों मे
पर अब वक्त आ गया है मिटा डालूँगा उन अन्धेरों को
छोड़ दूंगा इस मकान को जो मुकाम था ही नही
सुकून से मर सकूँ जहाँ, मेरा मुकाम अब बस वहीं

Saturday, April 21, 2007

तेरी मर्ज़ी

आय दिन ग़ज़लें कहता हूँ तेरे ख़यालों मे
तू सुने ना सुने तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

इंतज़ार तो करता हूँ बेसबब तेरी आहट का
आना ना आना तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

तेरा तो ख़याल भी काफ़ी है मुस्कुराने के लिए
नज़र भर जो इधर देखे तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

हर लम्हा ज़िंदगी का कर बैठा हूँ तेरे इश्क़ के नाम
अच्छा हो या बुरा अंजाम तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

बेवज़ूद सवालों मे दबा जा रहा हूँ ज़ालिम
जवाब तू दे या ना दे तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

तेरी मर्ज़ी मालूम है मुझे कि जिसमे मैं नहीं शामिल
फिर भी तेरी मर्ज़ी के आगे अपनी मर्ज़ी को छोड़ रखा है

Monday, April 2, 2007

मोहब्बत यादों से

कभी देखा है किसी को यादों से मोहब्बत करते
तोड़ी हुई क़समों की अधूरी सी नियामत रखते
इस दिल मे तो बस गयी है उस चेहरे की पहचान
जिसने तोड़ा है इसे हसरत-ए-मोहब्बत पूरी करते करते

वो समझते हैं भुला पाएँगे हम उन्हे अपने जीते
बेगाने इश्क़ मे लगाएँगे दिल ज़ख़्मों को सीते सीते
कैसे समझायें उन्हे कि बता भी नहीं सकते
उन्ही के इश्क़ मे मिटे जा रहे हैं अश्कों को पीते पीते

याद है हमें वो हर लम्हा जो ना चाहा था कभी बीते
काश थम जाती ज़िंदगी जब उन ज़ुलफ़ों के साये मे थे बैठे
जिस साँस की गर्मी सुलगाती थी एहसास-ए-मोहब्बत
उसी साँस की आस मे मरे जा रहे हैं बे इरादा जीते जीते

एक एक दिन गुज़रता है उनकी यादों मे हँसते रोते
हरेक रात मे उन्ही का सताता है ग़म जगते सोते
कोई उम्मीद तक बाक़ी नहीं कि अरमाने मोहब्बत पूरे होंगे
उन्हे तो पाया है बस ख्वाबों में हक़ीकत से खोते खोते

इल्म-ए-हक़ीक़त है हमे वो ना आएँगे अब जाते जाते
फिर भी दिल मे उन्ही की मोहब्बत के चराग हैं जलाते
दुआ है इस बर्बाद दिल की कि खुश रहें आबाद रहें वो
क्योंकि...
सह ना पाएँगे जो देखा उन्हे कल इसी बात पे रोते रोते

Monday, March 5, 2007

होली के रंग

सबको रंग मे रंगने को आज फिर आई है होली
नयी उमंगे भरने को देखो फिर आई है होली
इस बार जो रंग लगे वो ना उतरे अब कभी
यही उम्मीदें करता हूँ इतने रंग लाई है होली

खुशी के रंग, कामयाबी के रंग और लगे अमन के रंग
और एक रंग हो प्यार का जो छूटे ना अब कभी
हँसती खिलखिलाती मौज मनाती यही संदेश लाई है होली
तुमको गले लगाने को देखो फिर आई है होली

Saturday, March 3, 2007

प्रेम प्रसंग

वो अनुभूति प्रेम की एक परम आनंद की
एक आबोध आशा तुम्हारे ही सानिध्य की
कि जैसे कोई स्वप्न हो उठा जीवंत
सामग्री हुई पर्याप्त एक चरम मोक्ष की

तुम्हारे सुर्ख चित परिचित अधरों का
संलग्न माधुर वाणी में - वो एक स्पर्श
सिर्फ़ हल्का सा ही उल्लेख जिसका
आज भी भर देता मुझ में कितना हर्ष

मुझ में कर प्रकट तुमने विश्वास
जब आर्पण किया सर्वस्व निष्काम
वो आलिंगन कोमल मद मोहक
बन स्मृति बना संजीवन जीवनदान

वो आनंद समय अब हुआ अतीत
वो प्रणय कलह और प्रेम के गीत
वो तुमसे प्रेम ही था कुछ और नहीं
जो गया था मुझ से प्रतिपल जीत

भूला नहीं हूँ एक भी पल एक भी अंश
उस मनमोहक मादक क्रीडा को
कोमल वक्ष, मुंदे नयन, सिमटी देह,
उस प्रेमालिंगन में तामसी पीड़ा को

बस अब तो है अतुल अभिलाषा एक
ये क्रीडा तुमसे हो हर पीड़ा तुमसे हो
स्वप्न से सुंदर हो यथार्थ यह जीवन
प्रतिदिन प्रतिपल प्रेम प्रसंग तुमसे हो

Tuesday, February 27, 2007

परंतु क्यों... ?

विचलित कर दिया है तुमने मुझ को
करके ऐसी बातें... जिन मे
रोष है आक्रोश है निराशा है आक्षेप है
फिर भी है एक शैशवीय कोमलता

परंतु क्यों...

तुम्हे तो ऐसा ना जाना था
इतनी निर्बल और निराकार ना माना था
तुम तो थी मूर्ति साहस की दृढता की
एक अटल विश्वास और परछाई आशा की

समझ सकता हूँ तुम्हारी व्यथा
पर कुछ ऐसी ही है सांसारीक प्रथा
सुना है समय से पहले और भाग्य से ज़्यादा
मिलता नहीं कुछ - हो मृत्यु या मर्यादा

समय रहते ही जो संभाल ले अपना आप
त्रूटि पेहचान ले... कर ले पश्चताप
जगत मे उसे ही कहते हैं सक्षम विजेता
और जो जीवन भर पछताए वो कहलाय अचेता

क्रोध से कोई समाधान नहीं ओ मेरी नादान
अपने बारे मे चिंतन करो खोजो स्वाभिमान
और मान लो मेरी बात.. करो इष्ट का ध्यान
मुश्किल है असंभव नहीं वो मंगल कल्याण

तुम तो स्त्रोत हो शक्ति का प्रेम का
जीवन के अनेकों अनेक हर्षित प्रसंगों का
जो बीत गया भुला दो उसे, बस देखो अपना आज
उपस्थित है पास मे जो बजता हुआ प्रेम का साज़

Friday, January 26, 2007

एक प्रश्न

एक प्रश्न है तुम्हारे लिए...

देखा ही नहीं... मैने सुना है तुम्हे...
और छू कर बहुत सोचा है तुम्हे...
बिजली से चंचल आँधी से तेज़...
बताओ तो... तुम कौन हो?

हर पल डरता था ऊर्ज़ा से तुम्हारी...
कि झुलस ना जाऊं पास आकर तुम्हारे...
पर तुमसे जानकार भी ना हुआ परहेज़...
अब बताओ भी... तुम कौन हो?

सिर्फ़ चँद महीनो की उन बातों मे...
पूंछ लिया तुमने मेरा संसार...
इस धरती की रफ़्तार से भी तेज़...
बताओ ना... तुम कौन हो?

तुमसे तो इतना मिला जुला हूँ...
बार बार सपनो मे भी देखा है
इतनी पहचानी होकर भी अनजानी सेज...
बताओ... तुम कौन हो?

पल मे आई... पल मे चली गयी
करके वीराना मेरा वज़ूद...
अपने रंग मे छोड़ गयी ओ रंगरेज़
अब तो बताओ... तुम कौन हो?

अभी तक भी नहीं उभरा हूँ...
नयी - पुरानी तुम्हारी यादों से...
विवश हो जिसकी हर बात ली मैने सहेज...
अब बस बताओ... तुम कौन हो?

Tuesday, January 23, 2007

इंतज़ार

मालूम है फिर मानने को मन नहीं करता
ये किस दो राहे से गुज़र रहा हूँ मैं
पता नहीं क्यों उस दिन का इंतज़ार है
जब सब बिगड़ जाएगा हमेशा के लिए

यक़ीन नहीं होता कि ऐसा हो गया हूँ
क्यों अपने ही बुने जाल मे खो गया हूँ
कब तक निज़ाद पाऊँगा इस जद्द-ओ-ज़ेहद से
लगता तो नहीं कभी उभर पाऊँगा मैं

बस अब तो सिर्फ़ इंतज़ार है !!

कुछ अंतिम क्षण

ना मुझको ख़बर है
ना तुम्हे ही कोई अंदाज़ है
एक ख्वाब सी मालूम पड़ती हो...
बस जिसकी बुलंद आवाज़ है

कल तक तुम मेरे पास थी
पर फिर भी काफ़ी दूर थी...
यही सोचता था... कि कब तक
आख़िर कब तक उड़ेगा ये ख्वाब

पर अब भोर होने वाली है
थोड़ी देर मे रोशनी हो जाएगी
ख्वाब तो टूट जाएगा,
बस एक कसक सी रह जाएगी

क्या कभी फिर से दिखेगा
ये आधा अधूरा ख्वाब...
शायद... पूरा होने के लिए
या फिर से अधूरा रह जाने के लिए