Tuesday, February 27, 2007

परंतु क्यों... ?

विचलित कर दिया है तुमने मुझ को
करके ऐसी बातें... जिन मे
रोष है आक्रोश है निराशा है आक्षेप है
फिर भी है एक शैशवीय कोमलता

परंतु क्यों...

तुम्हे तो ऐसा ना जाना था
इतनी निर्बल और निराकार ना माना था
तुम तो थी मूर्ति साहस की दृढता की
एक अटल विश्वास और परछाई आशा की

समझ सकता हूँ तुम्हारी व्यथा
पर कुछ ऐसी ही है सांसारीक प्रथा
सुना है समय से पहले और भाग्य से ज़्यादा
मिलता नहीं कुछ - हो मृत्यु या मर्यादा

समय रहते ही जो संभाल ले अपना आप
त्रूटि पेहचान ले... कर ले पश्चताप
जगत मे उसे ही कहते हैं सक्षम विजेता
और जो जीवन भर पछताए वो कहलाय अचेता

क्रोध से कोई समाधान नहीं ओ मेरी नादान
अपने बारे मे चिंतन करो खोजो स्वाभिमान
और मान लो मेरी बात.. करो इष्ट का ध्यान
मुश्किल है असंभव नहीं वो मंगल कल्याण

तुम तो स्त्रोत हो शक्ति का प्रेम का
जीवन के अनेकों अनेक हर्षित प्रसंगों का
जो बीत गया भुला दो उसे, बस देखो अपना आज
उपस्थित है पास मे जो बजता हुआ प्रेम का साज़

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