Saturday, March 3, 2007

प्रेम प्रसंग

वो अनुभूति प्रेम की एक परम आनंद की
एक आबोध आशा तुम्हारे ही सानिध्य की
कि जैसे कोई स्वप्न हो उठा जीवंत
सामग्री हुई पर्याप्त एक चरम मोक्ष की

तुम्हारे सुर्ख चित परिचित अधरों का
संलग्न माधुर वाणी में - वो एक स्पर्श
सिर्फ़ हल्का सा ही उल्लेख जिसका
आज भी भर देता मुझ में कितना हर्ष

मुझ में कर प्रकट तुमने विश्वास
जब आर्पण किया सर्वस्व निष्काम
वो आलिंगन कोमल मद मोहक
बन स्मृति बना संजीवन जीवनदान

वो आनंद समय अब हुआ अतीत
वो प्रणय कलह और प्रेम के गीत
वो तुमसे प्रेम ही था कुछ और नहीं
जो गया था मुझ से प्रतिपल जीत

भूला नहीं हूँ एक भी पल एक भी अंश
उस मनमोहक मादक क्रीडा को
कोमल वक्ष, मुंदे नयन, सिमटी देह,
उस प्रेमालिंगन में तामसी पीड़ा को

बस अब तो है अतुल अभिलाषा एक
ये क्रीडा तुमसे हो हर पीड़ा तुमसे हो
स्वप्न से सुंदर हो यथार्थ यह जीवन
प्रतिदिन प्रतिपल प्रेम प्रसंग तुमसे हो

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