आय दिन ग़ज़लें कहता हूँ तेरे ख़यालों मे
तू सुने ना सुने तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है
इंतज़ार तो करता हूँ बेसबब तेरी आहट का
आना ना आना तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है
तेरा तो ख़याल भी काफ़ी है मुस्कुराने के लिए
नज़र भर जो इधर देखे तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है
हर लम्हा ज़िंदगी का कर बैठा हूँ तेरे इश्क़ के नाम
अच्छा हो या बुरा अंजाम तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है
बेवज़ूद सवालों मे दबा जा रहा हूँ ज़ालिम
जवाब तू दे या ना दे तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है
तेरी मर्ज़ी मालूम है मुझे कि जिसमे मैं नहीं शामिल
फिर भी तेरी मर्ज़ी के आगे अपनी मर्ज़ी को छोड़ रखा है
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1 comment:
kya baat hai! This one is really good. I like the ones with a slight twist in the end.
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