Tuesday, January 23, 2007

इंतज़ार

मालूम है फिर मानने को मन नहीं करता
ये किस दो राहे से गुज़र रहा हूँ मैं
पता नहीं क्यों उस दिन का इंतज़ार है
जब सब बिगड़ जाएगा हमेशा के लिए

यक़ीन नहीं होता कि ऐसा हो गया हूँ
क्यों अपने ही बुने जाल मे खो गया हूँ
कब तक निज़ाद पाऊँगा इस जद्द-ओ-ज़ेहद से
लगता तो नहीं कभी उभर पाऊँगा मैं

बस अब तो सिर्फ़ इंतज़ार है !!

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