ना मुझको ख़बर है ना तुम्हे ही कोई अंदाज़ है
एक ख्वाब सी मालूम पड़ती हो...
बस जिसकी बुलंद आवाज़ है
कल तक तुम मेरे पास थी
पर फिर भी काफ़ी दूर थी...
यही सोचता था... कि कब तक
आख़िर कब तक उड़ेगा ये ख्वाब
पर अब भोर होने वाली है
थोड़ी देर मे रोशनी हो जाएगी
ख्वाब तो टूट जाएगा,
बस एक कसक सी रह जाएगी
क्या कभी फिर से दिखेगा
ये आधा अधूरा ख्वाब...
शायद... पूरा होने के लिए
या फिर से अधूरा रह जाने के लिए
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