Friday, January 26, 2007

एक प्रश्न

एक प्रश्न है तुम्हारे लिए...

देखा ही नहीं... मैने सुना है तुम्हे...
और छू कर बहुत सोचा है तुम्हे...
बिजली से चंचल आँधी से तेज़...
बताओ तो... तुम कौन हो?

हर पल डरता था ऊर्ज़ा से तुम्हारी...
कि झुलस ना जाऊं पास आकर तुम्हारे...
पर तुमसे जानकार भी ना हुआ परहेज़...
अब बताओ भी... तुम कौन हो?

सिर्फ़ चँद महीनो की उन बातों मे...
पूंछ लिया तुमने मेरा संसार...
इस धरती की रफ़्तार से भी तेज़...
बताओ ना... तुम कौन हो?

तुमसे तो इतना मिला जुला हूँ...
बार बार सपनो मे भी देखा है
इतनी पहचानी होकर भी अनजानी सेज...
बताओ... तुम कौन हो?

पल मे आई... पल मे चली गयी
करके वीराना मेरा वज़ूद...
अपने रंग मे छोड़ गयी ओ रंगरेज़
अब तो बताओ... तुम कौन हो?

अभी तक भी नहीं उभरा हूँ...
नयी - पुरानी तुम्हारी यादों से...
विवश हो जिसकी हर बात ली मैने सहेज...
अब बस बताओ... तुम कौन हो?

Tuesday, January 23, 2007

इंतज़ार

मालूम है फिर मानने को मन नहीं करता
ये किस दो राहे से गुज़र रहा हूँ मैं
पता नहीं क्यों उस दिन का इंतज़ार है
जब सब बिगड़ जाएगा हमेशा के लिए

यक़ीन नहीं होता कि ऐसा हो गया हूँ
क्यों अपने ही बुने जाल मे खो गया हूँ
कब तक निज़ाद पाऊँगा इस जद्द-ओ-ज़ेहद से
लगता तो नहीं कभी उभर पाऊँगा मैं

बस अब तो सिर्फ़ इंतज़ार है !!

कुछ अंतिम क्षण

ना मुझको ख़बर है
ना तुम्हे ही कोई अंदाज़ है
एक ख्वाब सी मालूम पड़ती हो...
बस जिसकी बुलंद आवाज़ है

कल तक तुम मेरे पास थी
पर फिर भी काफ़ी दूर थी...
यही सोचता था... कि कब तक
आख़िर कब तक उड़ेगा ये ख्वाब

पर अब भोर होने वाली है
थोड़ी देर मे रोशनी हो जाएगी
ख्वाब तो टूट जाएगा,
बस एक कसक सी रह जाएगी

क्या कभी फिर से दिखेगा
ये आधा अधूरा ख्वाब...
शायद... पूरा होने के लिए
या फिर से अधूरा रह जाने के लिए