Thursday, April 2, 2009

पुष्पकली



एक मोहक पुष्पकली तुम... 
तेज़ धूप मे पली बढ़ी 
सुर्ख, सक्षम, संतप्त सी जान पड़ती थी 

संकुचित सुगंध का स्त्रोत तुम 
संचार किया तुमने मुझमे 
एक सविवेक आकर्षण का 
दिया आभास सार्थक यथार्थ का 

संशय भी था, संकोच भी 
और एक अकल्पनीय सी सोंच भी 
क्या होगा? 
कैसा होगा शृंगार तुम्हारी खुशबू से 

फिर भी ओत-प्रोत तुम्हारे विश्वास मे 
तोड़ लिया तुम्हे तुम्हारे आंगन से 
तुम्हारी छवि मे मेरी जीवन-रेखा 
मान्या प्रेम मे संपूर्ण जग देखा 

प्रत्येक स्पर्श से मुदित अधरों के 
एक एक पंखुड़ी कर खिल उठी तुम 
शृंगार बनी तुम मेरा अनुपम 
महक उठा मेरा तन उपवन

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