Thursday, April 2, 2009

मान्या...


मान्या...
तुम मेरी प्रेयसी एक आभास मधुरता का
विश्वास, जीवन में घुलते अपनेपन का
सुबह होते ही होता एक मंद मादक अहसास
कि तुम मेरे पास हो संलिप्त मेरी बाँहों में
फिर तुम्हे ही देखता जानता और सोचता मै
एक चुम्बन तुम्हारे होठों पे रसभरी से मीठा
और वो प्रणय आलिंगन कमल सरीखा
भर देता मुझ में हर्ष आनंद अपार  
सच में मान्या...
तुम मेरी प्रेयसी एक आभास मधुरता का

पुष्पकली



एक मोहक पुष्पकली तुम... 
तेज़ धूप मे पली बढ़ी 
सुर्ख, सक्षम, संतप्त सी जान पड़ती थी 

संकुचित सुगंध का स्त्रोत तुम 
संचार किया तुमने मुझमे 
एक सविवेक आकर्षण का 
दिया आभास सार्थक यथार्थ का 

संशय भी था, संकोच भी 
और एक अकल्पनीय सी सोंच भी 
क्या होगा? 
कैसा होगा शृंगार तुम्हारी खुशबू से 

फिर भी ओत-प्रोत तुम्हारे विश्वास मे 
तोड़ लिया तुम्हे तुम्हारे आंगन से 
तुम्हारी छवि मे मेरी जीवन-रेखा 
मान्या प्रेम मे संपूर्ण जग देखा 

प्रत्येक स्पर्श से मुदित अधरों के 
एक एक पंखुड़ी कर खिल उठी तुम 
शृंगार बनी तुम मेरा अनुपम 
महक उठा मेरा तन उपवन