Saturday, April 21, 2007

तेरी मर्ज़ी

आय दिन ग़ज़लें कहता हूँ तेरे ख़यालों मे
तू सुने ना सुने तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

इंतज़ार तो करता हूँ बेसबब तेरी आहट का
आना ना आना तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

तेरा तो ख़याल भी काफ़ी है मुस्कुराने के लिए
नज़र भर जो इधर देखे तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

हर लम्हा ज़िंदगी का कर बैठा हूँ तेरे इश्क़ के नाम
अच्छा हो या बुरा अंजाम तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

बेवज़ूद सवालों मे दबा जा रहा हूँ ज़ालिम
जवाब तू दे या ना दे तेरी मर्ज़ी पर छोड़ रखा है

तेरी मर्ज़ी मालूम है मुझे कि जिसमे मैं नहीं शामिल
फिर भी तेरी मर्ज़ी के आगे अपनी मर्ज़ी को छोड़ रखा है

Monday, April 2, 2007

मोहब्बत यादों से

कभी देखा है किसी को यादों से मोहब्बत करते
तोड़ी हुई क़समों की अधूरी सी नियामत रखते
इस दिल मे तो बस गयी है उस चेहरे की पहचान
जिसने तोड़ा है इसे हसरत-ए-मोहब्बत पूरी करते करते

वो समझते हैं भुला पाएँगे हम उन्हे अपने जीते
बेगाने इश्क़ मे लगाएँगे दिल ज़ख़्मों को सीते सीते
कैसे समझायें उन्हे कि बता भी नहीं सकते
उन्ही के इश्क़ मे मिटे जा रहे हैं अश्कों को पीते पीते

याद है हमें वो हर लम्हा जो ना चाहा था कभी बीते
काश थम जाती ज़िंदगी जब उन ज़ुलफ़ों के साये मे थे बैठे
जिस साँस की गर्मी सुलगाती थी एहसास-ए-मोहब्बत
उसी साँस की आस मे मरे जा रहे हैं बे इरादा जीते जीते

एक एक दिन गुज़रता है उनकी यादों मे हँसते रोते
हरेक रात मे उन्ही का सताता है ग़म जगते सोते
कोई उम्मीद तक बाक़ी नहीं कि अरमाने मोहब्बत पूरे होंगे
उन्हे तो पाया है बस ख्वाबों में हक़ीकत से खोते खोते

इल्म-ए-हक़ीक़त है हमे वो ना आएँगे अब जाते जाते
फिर भी दिल मे उन्ही की मोहब्बत के चराग हैं जलाते
दुआ है इस बर्बाद दिल की कि खुश रहें आबाद रहें वो
क्योंकि...
सह ना पाएँगे जो देखा उन्हे कल इसी बात पे रोते रोते